रूको ठहरो और यू-टर्न मारो

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आप क्या करते है जब आपका सिस्टम स्लो होता। फाइलें करप्ट होने लगती है। जाहिर तौर पर आप एंटी वायरस अपडेट करेंगे। जंक फाइलें डिलीट करेंगे। प्रोसेसर अपग्रेड करेगें। जरूरत के मुताबिक नयी विडोंज इस्टॉल करेगें। सिस्टम रिबूट करेगें। ठीक इसी तर्ज पर प्रकृति भी काम करती है। यहाँ पर प्रकृति से हमारा मतलब पारिस्थितिक तन्त्र (Ecological system) और इंसानी फितरत दोनों से ही है। पहले बात इंसानी फितरत की। ओल्ड टेस्टामेंट (Old Testament) में जिक्र आता है कि सृष्टि की रचना में स्थावर, जंगम, और चराचर की उत्पत्ति के बाद सबसे आखिर में प्रकृति ने इंसान को रचा। जिसका सीधा मतलब है कि प्रकृति के वरीयता क्रम (Order of nature) में मनुष्य सबसे आखिरी में आता है। कहीं ना कहीं प्रकृति मानव को ये बताना चाहती है कि जब खुदगर्जी जरूरत से ज़्यादा इंसान पर सवार हो जाये तो, उसे उसकी औकात से रूबरू कराया जाये। पेड़-पौधे, पहाड़, नदियां, पशु-पक्षी सभी प्रकृति के तयशुदा नियमों (Default rules) में जीवनयापन करते है। दूसरी ओर  इंसान की जरूरतों और खुदगर्जी ने उसे कुदरत से काफी दूर कर दिया है। इस्लाम में नमक हलाली की अवधारणा है, लेकिन इंसान प्रकृति के साथ हमेशा से ही नमक हराम बना रहा। उसने हमें मीठे फल दिये हमने उस पर कुल्हाड़ी चलाई। उसने हमारी प्यास मिटाने के लिए करूणा की नदी बहाई और हमने उसमें न्यूक्लियर कचरा (Nuclear waste) घोला। उसने हमारा वजूद बचाये रखने के लिए मदमस्त बयार चलायी, हमने उसमें अपने कारखानों का धुँआ मिलाया।

गौर से देखे तो प्रकृति साम्यता के अलिखित सिद्धान्त (Theory of Equilibrium) पर काम करती है। जब ब्रह्मांडीय च्रकों में आवश्यकता से अधिक बाहरी खासतौर से कृत्रिम हस्तक्षेप (Artificial intervention) होता है तो सृष्टि अपना संतुलन कायम करने के लिए कुछ बदलाव लाती है। प्रथम दृष्टया ये बदलाव विध्वंसक होते है लेकिन इनकी अंतोगति साम्यता और सन्तुलन स्थापित करती है। मौजूद Covid-19 का प्रकोप इसी तथ्य की सरसरी तस्वीर है। ये इंसानी हरकतों की नतीज़ा है। हमने जंगल नष्ट करके कई आहार श्रृंखलाओं (Food chains) को निर्ममता से खत्म किया। उसके बाद उन जीवों को अपना आहार बनाया, जिसके लिए हमारा पाचन तन्त्र (Digestive System) विकसित ही नहीं हुआ। इस तरह से जो वायरस वनीय आहार श्रृंखला का हिस्सा थे, वे अब हमारे शरीर में दाखिल हो चुके है। उभर रहे है खतरे अब जगज़ाहिर है। हमारी रोज की कारस्तनियां कुदरत को बुरी छलनी कर रही है। जिस सर्फ और साबुनों से रोजाना हम नहा रहे है, कपड़े धो रहे है। वो भूमिगत जल को दूषित कर रहा है। टॉयलेट पेपर की मांग पूरा करने के लिए रोजाना जंगलों का सफाया हो रहा है। रेस्त्रां (Restaurant) में मेज पर सजा मांसाहार भोजन हम बड़े चाव से खाते है। लेकिन ये सोचने की जरूरत नहीं महसूस करते कि इसके प्रोडक्शन, प्रोसेसिंग से लेकर थाली में आने तक कितने कार्बन फुट प्रिन्ट (Carbon foot print) बने। चेहरे पर मेकअप का नकाब ओढ़े भूल जाते है कि, इसमें कितने कैमिकल और जन्तुवसा (Animal fat) है। जिसका सीधा असर हमारे पारिस्थितिक तन्त्र पर होता है।

व्हॉट्सऐप और फेसबुक का इस्तेमाल करते हुए हम भूल जाते है कि, 4-जी टॉवरों से निकलने वाले रेडिएशन (Radiation) से गौरेय्या की चहचाहट अब आने वाली नस्लों के लिए कहानियां होगी। टेलीकॉम उद्योग (Telecom industry) से होने वाले रेडिएशन से पक्षी अपने घर रास्ता तक भूले जा रहे है। धरती के चुंबकीय क्षेत्र (Magnetic Field) को लेकर उनमें मतिभ्रम (Hallucinations) हो रहा है। चौबीसों घंटे मोबाइल लैपटॉप और कम्प्यूटर से निकलने वाला रेडिएशन हमारी प्रजनन क्षमता (Fertility) को बुरी तरह प्रभावित कर रहा है। लंबे समय तक इसकी ज़द में रहने वाली गर्भवती महिलाओं के गर्भस्थ शिशुओं पर इसका सीधा असर पड़ता है। गर्भपात, विकृतिपूर्ण शिशु (Miscarriage-Deformed baby) होना इसी ओर इशारा है। इसी रेडिएशन का नतीज़ा है कि इंसानों की डीएनए सीक्वेसिंग (DNA sequencing) में बदलाव आ रहा है। ये आगे चलकर क्या असर डालेगा सोचकर दिमाग ही कांप जाता है।

क्या कभी अपने सोचने की कोशिश की है सार्स,मर्स,इबोला, निपाह और कोरोना (Sars, Mars, Ebola, Nipah and Corona) क्या है। ये प्रकृति का अपना तरीका है सन्तुलन स्थापित करने का। बहुत से लोग Avenger Series के Thanos को खलनायक मानते होगें। लेकिन अगर उसकी सोच पर गौर किया जाये तो उसमें काफी गहरा दर्शन (Philosophy) छुपा हुआ है। ब्रह्मांड में संतुलन स्थापित करने के लिए विध्वंस। ठीक जैसे प्रकृति करती है। चलिये मान लेते है आजकल के इंसानों में कल्पना शक्ति का अभाव है। उसकी खुदगर्ज करतूतें आगे चलकर क्या गुल खिलायेगी। उसे पता नहीं है। हॉलीवुड की एक फिल्म है Mad Max Fury Road. इसे देखे और खुद से सवाल करे क्या हम आने वाली नस्लों को ये भविष्य देना चाहते है ?

ये वक़्त है कुदरत के प्रति नमक हलाल बनने का। इससे पहले प्रकृति खुद को डिलीट करे, अपग्रेड करे। हमें रूको ठहरो और यू-टर्न मारो का नियम अपनाना होगा।

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