#CoronaLockdown: इनका दर्द समझने वाला कोई नहीं

0

नई दिल्ली (क्षे.सं.): 21 दिनों के लॉकडाउन (lockdown) के दौरान दिल्ली से सटे बॉर्डर से कई दर्दनाक तस्वीर सामने आ रही है। प्रवासी दिहाड़ी मजदूर (daily wages labour) पैदल ही अपने कामों की ओर कूच कर रहे हैं। इनमें से ज्यादातर लोग ऐसे हैं, जिनका जीवन यापन दिन भर काम करने के बाद मिलने वाली मजदूरी से होता है। काम धंधा बंद होने के हालातों में इनका रोजगार छिन गया है। तंगी के चलते ये लोग पैदल ही अपने गांव घरों की ओर निकल रहे हैं। ज्यादातर दिहाड़ी मजदूर पूर्वांचल, बिहार और झारखंड (Bihar and Jharkhand) के हैं। पैसों की तंगी के कारण भूखे प्यासे और बेहाल ये लोग 1 दिन में कई किलोमीटर का सफर पैदल तय कर रहे हैं। इंटरस्टेट बस सुविधा उपलब्ध ना होने के कारण रास्ते भर में इन्हें पुलिस की बेरहम लाठियों का सामना करना पड़ रहा है। सोशल मीडिया (Social media) पर कई ऐसे मुद्दे सामने आ रहे हैं, जहां पुलिस इन लोगों के साथ ज्यादतियां कर रही है। दहशत और डर के बीच यह लोग कंधे पर बैठ टांगे कभी सड़क तो कभी रेलवे लाइनों से होकर गुजर रहे हैं।

माननीय सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) में इस मसले को लेकर जनहित याचिका दायर की गई, सुप्रीम कोर्ट की ओर से फरमान जारी किया गया कि, इन सभी प्रवासी मजदूरों के लिए दिल्ली में ही शेल्टर होम (shelter home), भोजन सहित मूलभूत व्यवस्था की जाए। लेकिन अदालत का फरमान और जमीनी हकीकत में भारी अंतर है। दिल्ली के गाजीपुर बॉर्डर, आनंद विहार और वैशाली इलाके में प्रवासी मजदूर बेबसी के बोझ तले धीरे-धीरे रेंगते हुए अपनी मंजिल की ओर बढ़ रहे हैं। प्रवासी मजदूरों के ये हालात कहीं ना कहीं केंद्र सरकार द्वारा लगाए गए लॉक डाउन के ब्लू प्रिंट पर गंभीर सवालिया निशान लगाते हैं। मात्र 4 घंटे के अल्टीमेटम पर लॉक डाउन जैसा बड़ा फैसला लेना कहां तक उचित है?

भारी जद्दोजहद के बीच किसी तरह ये लोग गांव पहुंच भी जा रहे हैं तो, बिना मेडिकल जांच के इन्हें गांव में घुसने भी नहीं दिया जा रहा है। गांवों की सीमा पर सबसे पहले इनका सामना ग्राम पंचायत द्वारा तैनात लठैतों से होता है, जो इनके के साथ सख्ती से पेश आते हैं। मेडिकल जांच रिपोर्टों के आधार पर ही ये लोग अपने परिवारों से मिल पाते हैं। उत्तर प्रदेश और बिहार सरकार भले ही कितने बड़े आश्वासन दे रही हो, लेकिन प्रवासी मजदूरों के हालात हमेशा से ही खराब रहे हैं। फिर चाहे बात सामान्य दिनों की ही क्यों ना हो।

Leave A Reply

Your email address will not be published.

This website uses cookies to improve your experience. We'll assume you're ok with this, but you can opt-out if you wish. Accept Read More