4.2 साल कम हुई इस राज्य के लोगों की उम्र

एयर क्वालिटी लाइफ इंडेक्स के अनुसार देहरादून, हरिद्वार और उधमसिंह नगर के लोग क्रमशः4.1 वर्ष, 6.6 वर्ष और 6.1 वर्ष ज्यादा जी सकते थे, अगर वायु गुणवत्ता विश्व स्वास्थ्य संगठन के दिशानिर्देशों के अनुरूप होती

देहरादून, 31अक्तूबर,2019: शिकागो विश्वविद्यालय, अमेरिका की शोध संस्थाएपिक’ (Energy Policy Institute at the University of Chicago-EPIC) द्वारा तैयारवायु गुणवत्ता जीवन सूचकांक’ (Air Quality Life Index – AQLI) का नया विश्लेषण दर्शाता है कि उत्तराखंड में वायु प्रदूषण की गंभीर स्थिति राज्य के नागरिकों कीजीवन प्रत्याशा’ (Life Expectancy) औसतन 4.2 वर्ष कम करती है, और जीवन प्रत्याशा में उम्र बढ़ सकती है अगर यहां के वायुमंडल में प्रदूषित सूक्ष्म तत्वों एवं धूलकणों की सघनता 10 माइक्रोग्राम प्रति क्यूबिक मीटर (विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा बताया गया सुरक्षित मानक) के सापेक्ष हो। एक्यूएलआई के आंकड़ों के अनुसार देहरादून के लोग4.1 वर्ष ज्यादा जी सकते थे, अगर विश्व स्वास्थ्य संगठन (World Health Organization) के दिशानिर्देशों को हासिल कर लिया जाता। 
       
                                 वर्ष 1998 में, इसी वायु गुणवत्ता मानक को पूरा करने से जीवन प्रत्याशा में 1.9 साल की बढ़ोतरी होती। लेकिन राज्य में देहरादून प्रदूषित जिलों की सूची में शीर्ष पर नहीं है। उत्तराखंड के अन्य जिले और शहर के लोगों का जीवनकाल घट रहा है और वे बीमार जीवन जी रहे हैं। उदाहरण के लिए हरिद्वार के लोगों के जीवनकाल में 6.6 साल की बढ़ोतरी होती, अगर वहां विश्व स्वास्थ्य संगठन के मानकों का अनुपालन किया जाता। इसी तरह उधमसिंह नगर, नैनीताल, पौड़ी गढ़वाल, चंपावत और अल्मोड़ा भी इस सूची में पीछे नहीं हैं, जहां के लोगों की जीवन प्रत्याशा में क्रमशः6.1 वर्ष, 4.2 वर्ष, 3.2 वर्ष, 2.3 वर्ष और 2.1 वर्ष की वृद्धि होती, अगर लोग स्वच्छ और सुरक्षित हवा में सांस लेते।
                               
                                                      दरअसल वायु प्रदूषण पूरे भारत में एक बड़ी चुनौती है, लेकिन उत्तरी भारत के गंगा के मैदानी इलाके (Indo-Gangetic Plain), जहां बिहार, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, पंजाब, चंडीगढ़, दिल्ली और पश्चिम बंगाल जैसे प्रमुख राज्य और केंद्र शासित प्रदेश आते हैं, में यह स्पष्ट रूप से अलग दिखता है। वर्ष 1998 में गंगा के मैदानी इलाकों से बाहर के राज्यों में निवास कर रहे लोगों ने उत्तरी भारत के लोगों के मुकाबले अपने जीवनकाल में करीब1.2 वर्ष की कमी देखी होती, अगर वायु की गुणवत्ता विश्व स्वास्थ्य संगठन के मानक को अनुरूप हुई होती। अब यह आंकड़ा बढ़ कर 2.6 वर्ष हो चुका है, और इसमें गिरावट आ रही है, लेकिन गंगा के मैदानी इलाकों की वर्तमान स्थिति के मुकाबले यह थोड़ी ठीकठाक है।

                                             एक्यूएलआई के अनुसार भारत के उत्तरी क्षेत्र यानी गंगा के मैदानी इलाके में रह रहे लोगों की जीवन प्रत्याशा करीब 7 वर्ष कम होने की आशंका है, क्योंकि इन इलाकों के वायुमंडल मेंप्रदूषित सूक्ष्म तत्वों और धूलकणों से होने वाला वायु प्रदूषणयानी पार्टिकुलेट पॉल्यूशन (Particulate Pollution) विश्व स्वास्थ्य संगठन के तय दिशानिर्देशों को हासिल करने में विफल रहा है। शोध अध्ययनों के अनुसार इसका कारण यह है कि वर्ष 1998 से 2016 में गंगा के मैदानी इलाके में वायु प्रदूषण 72 प्रतिशत बढ़ गया, जहां भारत की 40 प्रतिशत से अधिक आबादी रहती है। वर्ष1998 में लोगों के जीवन पर वायु प्रदूषण का प्रभाव आज के मुकाबले आधा होता और उस समय लोगों की जीवन प्रत्याशा में 3.7 वर्ष की कमी हुई होती।

                                                     इन निष्कर्षों की घोषणाएयर क्वालिटी लाइफ इंडेक्सके मंच पर इसके हिंदी संस्करण में विमोचन करने के दौरान की गई, ताकि वायु गुणवत्ता जीवन सूचकांक उसपार्टिकुलेट पॉल्यूशनपर अधिकाधिक नागरिकों और नीतिनिर्माताओं को जागरूक और सूचनासंपन्न बना सके, जो पूरी दुनिया में मानव स्वास्थ्य के लिए सबसे बड़ा खतरा बन गया है।

                                               शिकागो विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्र के मिल्टन फ्राइडमैन प्रतिष्ठित सेवा प्रोफेसर और एनर्जी पॉलिसी इंस्टीट्यूट (EPIC) के निदेशक डॉ माइकल ग्रीनस्टोन ने कहा कि ‘‘एयर क्वालिटी लाइफ इंडेक्स के हिंदी संस्करण की शुरुआत के साथ, करोड़ों लोग यह जाननेसमझने में समर्थ हो पाएंगे कि कैसे पार्टिकुलेट पॉल्यूशन उनके जीवन को प्रभावित कर रहा है, और सबसे जरूरी यह बात जान पाएंगे कि कैसे वायु प्रदूषण से संबंधित नीतियां जीवन प्रत्याशा को बढ़ाने में व्यापक बदलाव पैदा कर सकती हैं।’’

                        अगर भारत अपनेराष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम’ (National Clean Air Program-NCAP) के लक्ष्यों को प्राप्त करने में सफल रहा और वायु प्रदूषण स्तर में करीब 25 प्रतिशत की कमी को बरकरार रखने में कामयाब रहा, तोएक्यूएलआईयह दर्शाता है कि वायु गुणवत्ता में इस सुधार से आम भारतीयों की जीवन प्रत्याशा औसतन 1.3 वर्ष बढ़ जाएगी। वहीं उत्तरी भारत के गंगा के मैदानी इलाकों में निवास कर रहे लोगों को अपने जीवनकाल में करीब 2 वर्ष के समय का फायदा होगा।
                
                                        आज दिल्ली मेंएक्यूएलआईके हिंदी संस्करण के विमोचन के अवसर पर माननीय सांसद औरवैश्विक युवा नेता, विश्व आर्थिक मंच’ (Young Global Leader, World Economic Forum) श्री गौरव गोगोई ने कहा कि ‘‘अव्वल दर्जे की रिसर्च यह संकेत करती है कि वायु प्रदूषण में कमी और जीवनकाल में वृद्धि के बीच स्पष्ट संबंध है। स्वच्छ वायु की मांग के लिए नागरिकों के बीच जागरूकता बेहद महत्वपूर्ण है और एक्यूएलआई सही दिशा में एक कदम है। मैं 1981 के वायु अधिनियम(Air Act) में संशोधन के लिए संसद में एक निजी विधेयक प्रस्तावित कर रहा हूं, जो बढ़ते वायु प्रदूषण के कारण पैदा हो रहे स्वास्थ्य संबंधी दुष्प्रभावों को रेखांकित करता है।’’
                                               
                                                    एक्यूएलआई से संबंधित स्टडी समकक्षविशेषज्ञों के मूल्यांकन एवं अध्ययनों पर आधारित है, जिसे प्रोफेसर माइकल ग्रीनस्टोन और सहलेखकों एवं शोधार्थियों की टीम ने चीन केयूनिक नैचुरल एक्सपेरिमेंट’ (Unique Natural Experiment) से प्रेरित होकर तैयार किया है, जो चीन केहुएई रिवर विंटर हीटिंग पॉलिसीसे जुड़ी है। इसप्राकृतिक प्रयोगने उन्हें वायु प्रदूषण के दुष्प्रभावों को अन्य कारकों से अलग करने का मौका दिया, जो मानव स्वास्थ्य को प्रभावित करते हैं और इसी क्रम में उन्होंने भारत तथा उन देशों में यह अध्ययन किया, जहां आज प्रदूषित सूक्ष्म तत्वों और धूलकणों की सघनता सबसे ज्यादा है। फिर उन्होंने इन अध्ययनों के परिणामों को विविध क्षेत्रों में बेहद स्थानीय स्तर परवैश्विक सूक्ष्म प्रदूषक मापदंडों’ (Global Particulate Pollution Measurement) के साथ संयुक्त रूप से जोड़ दिया। इससे उपयोगकर्ताओं को दुनिया के किसी क्षेत्र या जिले से संबंधित आंकड़ों पर दृष्टिपात करने का अवसर मिलता है और उनके जिले में स्थानीय वायु प्रदूषण के स्तर से उनके जीवन प्रत्याशा पर पड़ रहे प्रभावों को समझने में मदद मिलती है।
                                              
                                      हिंदी संस्करण की शुरुआत और आधिकारिक वेबसाइट पर इससे जुड़ी जानकारी उपलब्ध कराने से करीब पिछले साल पहले आरंभ हुएएक्यूएलआईके प्रचारप्रसार को और भी गति एवं मजबूती मिलेगी।एक्यूएलआईअब तीन भाषाओंअंग्रेजी, हिंदी तथा मंडेरिन चाइनीज में उपलब्ध है और पांच भाषाओं में प्रमुख प्रदूषकों से संबंधित व्यक्तिगत विश्लेषण को मुहैया करा रहा है और इस सूचकांक का उद्देश्य दुनिया की अधिकाधिक आबादी को सूचनासंपन्न बनाना है। यह मिशन सफल भी हो रहा है, करीब 161 देशों के लगभग 30 हजार लोगों ने इस मंच का इस्तेमाल किया है। साथ ही साथ, एक्यूएलआई की शुरुआत के बाद करीब 300 मीडिया संस्थानों, जिनकी पहुंच दुनिया भर में एक अरब से ज्यादा लोगों तक है, ने इस सूचकांक और इसके महत्वपूर्ण निष्कर्षों को रेखांकित और प्रसारित किया है।एक्यूएलआईकोफास्ट कंपनी’ (Fast Company) द्वारा वर्ष 2019 कादुनिया बदलने वाला विचार’ (World Changing Idea) का नामकरण भी किया गया है।

Leave a comment

This website uses cookies to improve your experience. We'll assume you're ok with this, but you can opt-out if you wish. Accept Read More