राज्यसभा में चल रही कवायदे, क्या संकेत देती है…

आधुनिक भारतीय राजनीति में गृहमंत्री अमित शाह को चाणक्य के नये संस्करण के तौर पर देखा जा रहा है। संसदीय बिसात पर उनकी हर मोहरे सीधी पड़ती

Editorial: पानी की एक मूलभूत प्रकृति है, बहते-बहते वो अपने लिए रास्ता खोज लेता है। संसदीय गलियारों में ठीक यहीं रूख़ भाजपा ने अख़्तियार कर किया है। सत्ता में फिर से वापसी के बाद व्यूह रचना करने में उसको वो महारत हासिल हो गयी है, जिसकी भविष्यवाणी राजनैतिक पंड़ित भी नहीं कर सकते। अगला दांव क्या होगा, सियासी तरकश में अगला तीर कौन-सा होगा, लक्ष्य कैसे भेदा जायेगा। सब कुछ अप्रत्याशित और हतप्रभ करने वाला है।

आधुनिक भारतीय राजनीति में गृहमंत्री अमित शाह (Home Minister Amit Shah) को चाणक्य के नये संस्करण के तौर पर देखा जा रहा है। संसदीय बिसात पर उनकी हर मोहरे सीधी पड़ती दिख रही है, हर चाल विरोधियों के लिए मात लेकर आ रही है। लोकसभा और राज्यसभा (Lok Sabha and Rajya Sabha) दोनों ही सदनों में उनके राजनैतिक वार से विपक्षी त्राहिमाम्-त्राहिमाम् करते दिख रहे है। विपक्षीय चक्रव्यूह को भेदते हुए जिस तरह से इस संसद सत्र (Parliament Session) में एक्जीक्यूटिव प्रोडक्टिविटी (Executive Productivity) दिखी वो अपने आप में बधाई के काबिल है। भाजपा की दूसरी पारी के पहले सत्र में 15 बिल पारित करवाये गये है, इसे भारतीय लोकतन्त्र के ज्ञात इतिहास में अभूतपूर्व घटना के तौर पर देखा जायेगा।   विपक्षियों की मजबूत किलेबंदी और एकता को भेदकर जिस तरह से ये उपलब्धि हासिल की गयी है, ये भाजपा के राजनीतिक रणकौशल की झलक मात्र है।

नेशनल मेडिकल कमीशन बिल (National Medical Commission Bill), सूचना का अधिकार (संशोधित) अधिनियम (Right to Information), राष्ट्रीय जांच एजेंसी (संशोधित) अधिनियम (National Investigation Agency Act), जम्मू कश्मीर आरक्षण (संशोधित) अधिनियम (Jammu Kashmir Reservation Act),  मुस्लिम महिला (विवाह सुरक्षा अधिकार) अधिनियम, भारतीय चिकित्सा परिषद (संशोधित) और जम्मू कश्मीर पुर्नगठन बिल जैसे मसलों पर चर्चा में विपक्ष ने काफी हंगामा किया, लेकिन भाजपाई अमोघ अस्त्र के सामने समस्त विपक्ष चारों खाने चित्त पड़े दिखायी दिये। इन सियासी कवायदों ये संदेश साफ तौर पर नज़र आ रहा है कि, अब संसद में संख्याबल का कोई वजूद नहीं रह गया है।

भाजपायी योद्धा किसी भी बिल को पास कराने की कुव्वत रखते है। जिस चातुर्य के साथ ट्रिपल तलाक बिल पास कर लिया गया, वो अपने आप में अबूझ पहेली है। राजनीतिक गणित के ओर देखे तो राज्यसभा में एनडीए की ताकत 10 अंको तक सीमित है, ट्रिपल तलाक पर वोटिंग के बाद भाजपाई खेमे को विपक्ष की तुलना में 16 वोट ज्यादा मिले। इसमें उन्हें साथ मिला क्षेत्रीय क्षत्रपों का, जिसमें बीजू जनता दल की भूमिका को रेखांकित करना यहाँ आवश्यक है।  

सात सांसदों वाले बीजद ने लोकसभा और राज्यसभा दोनों ही जगह इस बिल की खुलकर मुखालफत की थी। लेकिन हालिया तस्वीर काफी बदली-बदली सी नज़र आयी। दोनों ही सदनों में वो सरकार के साथ दम भरती नज़र दिखी। सरकार के साथ आने के लिए उसकी क्षेत्रीय आंकाक्षायें है, जिसकी पूर्ति मोदी सरकार कर सकती है। आमतौर पर क्षेत्रीय दल केन्द्र से अच्छे संबंध बनाये रखने की कोशिश करते है।

अक्सर ये ही समीकरण केन्द्र को पर्याप्त माइलेज दे जाता है। छह सांसदों वाली तेलंगाना राष्ट्र समिति ने विधेयक के खिलाफ अपना मोर्चा खोलते हुए सदन से वॉकआउट कर दिया। ताकि वो अपने वोटबैंक को ये संदेश दे सके कि,वो इससे सहमत नहीं है। ठीक इसी तरह की कदमताल वाईएसआरसीपी भी करती दिखी। बसपा की गैर मौजूदगी को मोदी सरकार की रणनीति से जोड़कर देखा जा रहा है। 30 से ज़्यादा विरोध करने वाले विपक्षी सदस्य दल वॉक आउट कर गये या फिर सदन में हाज़िर ही नहीं हुए।

विधेयक की वोटिंग प्रक्रिया के दौरान कांग्रेस (Congress), राजद (RJD), द्रमुक (DMK), पीडीपी (PDP), टीडीपी (TDP), केरल कांग्रेस, आईयूएमएम, तृणमूल, एनसीपी और सपा के कई सदस्य सदन से नदारद दिखे। एनडीए के साथी दल जदयू और अन्नाद्रमुक शुरूआती दौर में विधेयक के मसौदे को लेकर काफी मुखर दिखे अन्ततोगत्वा वे भी नतमस्तक हो गये। धर्मनिरपेक्ष छवि को कायम रखते हुए विरोध में वोट ना करके वॉक आउट की शरण ली। लेकिन इससे भाजपा को कोई खासा फर्क नहीं पड़ा।

मौजूदा सांसदों की संख्या विजयी श्री के लिए पर्याप्त थी। अमित शाह के दांवो से धराशायी पड़े विपक्षी दलों के बीच की खाई साफ दिखाई दे रही थी। तालमेल की कमी और संवादहीनता विपक्षी एकता के लिए भारी पड़ गया। ये कांग्रेस और टीएमसी की सियासी तैयारियों पर सवालिया निशान लगाते है। सदन में कांग्रेस संख्याबल के हिसाब से बड़ा विपक्षी दल है। आरटीआई और ट्रिपल तलाक पर कांग्रेसी सुषुप्तावस्था साफ दिखायी दी। विधेयक को रोकने में उनकी ओर से कोई ठोस प्रयास नहीं हुए। 

ऐसे में क्या मान लेना चाहिए कि पिछले पाँच सालों में भाजपा के खिलाफ हुई विपक्षी गोलबंदी बिखर रही है ? या धर्मनिरपेक्षता के किले पर भगवा ध्वज़ा लहराने वाली है ? आखिर इस साल ऐसा क्या खास हुआ कि,धर्म निरपेक्षता का ढोल पीटने वाले राजनैतिक दल जिनके कारण ट्रिपल तलाक बिल दो बार रोका गया था, वो एकाएक पारित हो गया। भाजपा ने ऐसा कौन-सा मंत्र उनके कानों में फूंक दिया कि, उनका ह्दय परिवर्तन हो गया?

इस सवाल के जवाब के लिए थोड़ा फ्लैश बैक में जाना होगा,साल 2014 से 2019 के दरम्यां नरेन्द्र मोदी की अगुवाई में भाजपा की ताकत को बढ़ता देख, कांग्रेस ने हर उस मुद्दे पर नरमी बरती, जिसे भगवा ब्रिगेड तुष्टीकरण के तराजू में तौलती थी। जिसके चलते राहुल गांधी का मंदिर प्रेम जागा था। कांग्रेस का यहीं रूख अन्दरखाने ट्रिपल तलाक के लिए भी रहा होगा। ट्रिपल तलाक पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद कांग्रेस को यू-टर्न के लिए कोई रास्ता ही मयस्सर नहीं हुआ। वो अपने बुने हुए जाल में फंसती चली गयी।

नतीजन एक समय ऐसा भी आया जब वो इसे अपराध की श्रेणी में लाने के लिए कोशिशें करने लगी। कांग्रेसी खेमे के अन्दर उसके दलपतियों में, इस बात के लिए आपसी सहमति की कोई गुजांइश नहीं बनती दिखी रही थी। ऐसे में आगे कांग्रेस के लिए विपक्ष की रहनुमाई करना मुश्किल होता दिख रहा है। कांग्रेसी आदर्श जिन मुद्दों को विभाजनकारी मानते है, उस पर कांग्रेस भाजपा का साथ दे तो, ये अपने आप में आत्मसमर्पण वाली स्थिति बन जायेगी। ऐसे कांग्रेस में काफी ऊहापोह के हालात बनते दिख रहे है।

कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता ने हालिया वक़्त की मांग को देखते हुए, व्यावहारिक राजनीति की वकालत करते हुए लिंचिंग, ‘अल्पसंख्यकों के हित, मानवाधिकारों और आरटीआई जैसे उदारवादी मसलों के साथ मजबूती से खड़े रहने की नसीहत दी। अगर ऐसा करने में कांग्रेस नाकाम रहती है तो कांग्रेस और भाजपा के बीच कोई खासा फर्क नहीं रह जायेगा। कई मौके पर क्षेत्रीय दलों ने कांग्रेस को पीठ दिखायी है। वर्तमान समय कांग्रेसियों के लिए शापित है। 

देश के दूसरे विपक्षी दलों पर अस्तित्व का संकट मंडरा रहा है। ऐसे में वो उन मुद्दों पर भाजपा के घेर रहे है, जो सीधे तौर पर हिन्दुत्व से जुड़े है। इन हालातों में भाजपा पर धुव्रीकरण की राजनीति का आरोप लगाना कांग्रेस के लिए काफी भारी साबित हो सकता है। कांग्रेस के लिए इस समय आगे कुआं, पीछे खाई वाली स्थिति बन गयी है। अगर वो अपनी परम्परागत वैचारिक राजनीति को कायम रखते हुए उससे चिपकी रही तो ध्रुवीकरण को बल मिलेगा। अगर वह अपना रुख नरम रखती है तो उसके सामने धीरे-धीरे बैकफुट पर जाने का खतरा पैदा हो जाएगा।

ऐसे में इस सियासी चक्रव्यूह के शिल्पकार अमित शाह के कौशल को वाकई नमन करना पड़ेगा। उनकी रणनीतियों के सामने विपक्ष के सियासी सूरमाओं को पॉलिटिकल पैरालिसिस हो गया। ट्रिपल तलाक तो आने वाले दिनों की बानगी भर है। कुल जमा ये है कि, अटल बिहारी बिहारी के नक्शेकदम पर चलते हुए गृहमंत्री अमित शाह हस्तिनापुर के नये विदुर बने गये है। उनकी नीतियों से भाजपायी पौधशाला की आगामी नस्लें कैसी व्यूह रचना सीखती है, ये देखना काफी दिलचस्प रहेगा।

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