जनता ढ़ोती, सरकार और आरबीआई की अदूरदर्शिता का भार

एक बीमार महिला जिसके नौ लाख रुपये फंसे हैं उसे रोता देख मन बहुत

-नीतिन ठाकुर
स्वतन्त्र पत्रकार

यस बैंक के ग्राहकों के प्रति मेरे मन में सिर्फ दुख है। सरकार और आरबीआई (RBI) की अदूरदर्शिता का भार हमें और आपको ही उठाना है। टीवी स्क्रीन पर एक बीमार महिला जिसके नौ लाख रुपये फंसे हैं उसे रोता देख मन बहुत विकल हुआ। यही हाल महाराष्ट्र चुनाव से पहले एक को- ऑपरेटिव बैंक (Co-operative Bank) का हुआ था। किसी बहकावे में मत आइए। आपको समझाने का प्रयास किया जाएगा कि इसमें सरकार क्या करेगी वगैरह वगैरह लेकिन सच यही है कि ऐसे मामलों में दोषी “चौकीदार” ही माना जाता है। हमारे और आपके पैसे सुरक्षित रहें इसकी ज़िम्मेदारी सरकार और उसके द्वारा तय की गई नियामक संस्थाओ (Regulatory bodies) की ही है। यदि ये फेल हुए तो ज़िम्मा भी इन्हीं का है और सबसे पहले सजा भी इन्हें ही मिलनी चाहिए। अधिक समझने के लिए पश्चिम के मामले देखें जहां से बैंकिंग सिस्टम हमने सीखा है। यूं ही बैंकिंग को कई विशेषज्ञ “लीगल फ्रॉड सिस्टम” (Legal fraud system) नहीं करार देते और जब जब ये डूबते या भागते हैं इस भयावह सच (Terrible truth) को ज़िंदा कर देते हैं कि आम आदमी की गाढ़ी कमाई तक कहीं महफूज़ नहीं। अब तो आप घर में भी नहीं रख सकते क्योंकि उसके अलग खतरे हैं। बैंकिंग सेक्टर (banking sector) की लगातार टूटती कमर अर्थव्यवस्था का सच बता रही है। बेकार के आंकड़ों में तर्क खोजना हो तो वो अलग बात है।

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