Jitiya Vrat 2020: संतान की दीर्घायु और मंगल कामना के व्रत जिउतिया की कथा

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नई दिल्ली (यर्थाथ गोस्वामी): जिउतिया व्रत (Jitiya Vrat) ज़्यादातर पूर्वांचल क्षेत्र में मनाया जाता है। इसे जितिया और जीवित्पुत्रिका व्रत (jivitputrika vrat) नामों से भी जाना जाता है। इसे व्रत को ज़्यादातर मांये अपने बेटों के लिए रखती है। व्रत पूरी तरह से निर्जला और निराहार है। सांय काल के दौरान महिलायें तालाब, पोखरों, डीह स्थान और ब्रह्मस्थान पर एकत्र होकर जिउतिया माई का पूजन कर कथा सुनती है। सनातन परम्परा में जिउतिया माई को आदिलक्ष्मी का करूणामय रूप माना गया है। व्रत की समाप्ति अगले दिन प्रात: काल हो जाती है। प्रसाद ग्रहण करने के बाद महिलायें अपने पुत्रों को सोने-चांदी से बनी जिउतिया (सूर्य-चन्द्र की सांकेतिक आकृतियों से बनी माला) पहनाती है। व्रत से एक दिन पहले सरपुतिया की सब़्जी (तोरी की तरह एक सब़्जी) सभी व्रती महिलायें खाकर व्रत का संकल्प लेती है। इस दिन महिलायें बरियार की दातुन और नेनुआ के पत्ते (एक तरह की सब्ज़ी) काफी सरगर्मी से खोजती है। व्रत में इन सामग्रियों का विशेष महात्मय होता है।

स्थापित लोक मान्यताओं के अनुसार द्वापर के अन्त और कलियुग की शुरूआत पर जब कौरवों की सेना पूरी तरह परास्त हो चुकी थी। तब गुरु द्रौणाचार्य के पुत्र अश्‍वत्‍थामा (Ashwatathma, son of Draunacharya) ने रूष्ट होकर अर्जुन की पुत्रवधु और अभिमन्यु की पत्नी उत्तरा के गर्भ को नष्ट करने के लिए ब्रह्मास्त्र चलाया। उत्तरा ठाकुर श्री बांके बिहारी में अनन्य भक्त थी। तभी उत्तरा ने ठाकुर श्री बांके बिहारी (Thakur Shri Banke Bihari) और श्रीमती राधारानी का स्मरण माँ आद्यशक्ति सन्तान लक्ष्मी रूप (Smt. Radharani remembers as Goddess Adyashakti Santan Lakshmi) में किया। गर्भस्थ शिशु की रक्षा के लिए उत्तरा ने मानस याचना की। अनन्य भक्त में याचना पर श्रीकृष्ण ने ब्रह्मास्त्र निष्प्रभावी कर दिया और श्रीमती राधा रानी ने अपने माँ आद्यशक्ति सन्तान लक्ष्मी स्वरूप में गर्भस्थ शिशु को सुरक्षा कवच प्रदान किया। जिस ब्रह्मास्त्र (Brahmastra) समस्त त्रिभुवनों ने कोई नहीं रोक सकता, उससे उत्तरा का गर्भ नष्ट होने से बच गया। इसलिए तभी से इसे जीवित्पुत्रिका नाम से जाना गया।

इस घटना से प्रसन्न होकर उत्तरा सहित पांडवों के समस्त वंश ने श्रीमती राधा रानी के माँ आद्यशक्ति सन्तान लक्ष्मी स्वरूप की स्तुति की। उत्तरा ने कृष्ण रूप भगवान विष्णु से प्रार्थना की, जो भी इस दिन का स्मरण करते हुए व्रत रखेगी उनके पुत्र को मेरे पुत्र की तरह आपका संरक्षण मिलेगा। तब से लेकर आज तक इस व्रत का निर्वहन किया जा रहा है।

इसी व्रत से जुड़ी एक अन्य कथा के अनुसार जीमुतवाहन नाम के एक न्यायप्रिय और दयालु राजा थे। नगर भ्रमण करते हुए उन्हें एक वृद्धा रोती हुई दिखी। उसने राजा को बताया कि उनके यहां रोज एक गरूड़ आता है और गांव में किसी न किसी के बच्चे को खा लेता है। और आज वृद्धा के बेटे के बारी है। ये बात सुनकर जीमुतवाहन ने वृद्धा महिला को वचन दिया कि वो उसके पुत्र पर किसी तरह का कोई संकट नहीं आने देगें। राजा वृद्धा के बताये स्थान पर पहुँच जाते है। कुछ देर बाद जब वहां गरूण आता है तो राजा उससे प्रार्थना करते है कि वो किसी बच्चे को अपना भोजना बनायें। राजा की ये बात गरूण मनाने को तैयार नहीं होता है। बदले में राजा गरूड़ के सामने भक्षण के लिए अपना शरीर प्रस्तुत कर देता है। गरूण एक-एक करके उनके अंगों के नोंचना शुरू कर देता है। राजा बेहद धैर्यपूर्ण तरीके से गरूण का निवाला बनते चले जाते है। आखिर में उनकी सहन क्षमता और धैर्य को देखकर गरूड़ उनसे उनका परिचय पूछता है। राजा बताते है कि वे सूर्यवंशी शालिवाहन के पुत्र है। जीमुतवाहन करूणा और दयालुता से खुश होकर गरूड़ उनसे कोई वर मांगने के लिए कहता है। इस पर राजा उनसे मृत्युलोक में सभी बच्चों को अभयदान देते हुए और उनका भक्षण ना करने का वरदान मांगते है। गरूड़ प्रसन्नतापूर्वक उन्हें ये मनवांछित वर प्रदान कर देते है। मृत बच्चों को नागलोक से अमृत लाकर पुर्नजीवित भी करते है।

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