North East Delhi riots: जावेद अख्तर उतरे दंगाई के बचाव में

उत्तर पूर्वी दिल्ली में दंगों की आग अब लगभग शांत हो चुकी है। सुरक्षाबलों और दिल्ली पुलिस की मुस्तैदी की वजह से हालात अब काबू में हैं। लेकिन दूसरी ओर सोशल मीडिया पर बयानबाजियों का दौर काफी गर्म है

नई दिल्ली/मुंबई: उत्तर पूर्वी दिल्ली (North East Delhi) में दंगों की आग अब लगभग शांत हो चुकी है। सुरक्षाबलों और दिल्ली पुलिस (Delhi Police) की मुस्तैदी की वजह से हालात अब काबू में हैं। लेकिन दूसरी ओर सोशल मीडिया पर बयानबाजियों का दौर काफी गर्म है। आम आदमी पार्टी (Aam Aadmi Party) से पार्षद ताहिर हुसैन (Tahir Hussain) का नाम दंगा फैलाने और इंटेलिजेंस ब्यूरो के कर्मचारी की हत्या करने सामने आ रहा है। बीते दिन अरविंद केजरीवाल इस मुद्दे पर अपना रुख साफ कर चुके हैं। अप्रत्यक्ष रूप से उन्होंने ताहिर हुसैन से अपना पल्ला खींचते हुए, मीडिया के सामने कहा कि दंगा फैलाने वालों को सजा होनी चाहिए। पूरी प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान उन्होंने कहीं भी ताहिर हुसैन का बचाव नहीं किया।

इस बीच बॉलीवुड जाने-माने गीतकार जावेद अख्तर (Javed Akhtar) ताहिर हुसैन के बचाव में उतरे हैं। उन्होंने ट्वीट कर लिखा कि, बहुत से लोगों को मौत के घाट उतारा गया। कईयों के घरों को आग के हवाले किया गया साथ ही बहुत से लोग बुरी तरह जख्मी भी हुए। कई दुकानें लूट ली गई। इस दौरान एक बड़ी आबादी बेघर हो गई। लेकिन दिल्ली पुलिस (Delhi Police) में सिर्फ एक ही मकान को सील किया, वो भी उसके मालिक को देखते हुए। बदकिस्मती से उस मकान का मालिक ताहिर था। दिल्ली पुलिस जिस पूर्वाग्रह की राह पर लगातार चल रही है उसके लिए मेरी ओर से उन्हें सलाम।

दिल्ली पुलिस पर लांछन लगाने के बाद जावेद अख्तर यहीं नहीं रुके, मामले को सांप्रदायिक रंग देते हुए उन्होंने एक और ट्वीट किया। इस ट्वीट में अपने पुराने ट्वीट को लेकर उन्होंने सफाई दी और लिखा- कितना आसान है मेरी बातों को ना समझना। मैं यह नहीं कह रहा जाहिर ही क्यों। बल्कि मैं तो यहां यह कहना चाह रहा हूं, सिर्फ जाहिर ही क्यों? उन लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज क्यों नहीं की गई, जिन्होंने पुलिस की मौजूदगी में खुलेआम दंगा फैलाने की धमकी दी थी। यहां पर सिर्फ माननीय सर्वोच्च न्यायालय को ही अधिकार है कि, वो इस दिल्ली पुलिस की भूमिका की जांच करें, जिसकी वजह से दंगों का नंगा नाच हुआ|

जावेद अख्तर का ट्वीट ऐसे वक्त में सामने आया है। जब दिल्ली में हिंसा और दंगों का दौर थम चुका है। ऐसे में भड़काऊ बातें और मामले को मजहबी रंग देना बहुत ही गलत है। जहां एक और लोग शांति अमन भाईचारे की अपील कर रहे हैं वहीं दूसरी ओर जावेद अख्तर का यह रूप तस्वीर से बिल्कुल उलट है।

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