Editorial: भारतीय राजनीति में CIA से लेकर KGB तक का रहा है दखल, ये है राजनीतिक गलियारों के बदनाम किस्से

भारतीय राजनीति में CIA से लेकर KGB तक का रहा है दखल, ये है राजनीतिक गलियारों के बदनाम किस्से। इंटेलीजेंस एजेन्सियां (Intelligent agencies) साम-दाम-दंड-भेद

नई दिल्ली (अनुज गुप्ता): Saiyrat Matkal, CIA और KGB के किस्से-कहानियां और हॉलीवुड़ की फिल्में जिन लोगों ने देखी होगी, उन्हें ये अच्छे से अन्दाज़ा होगा कि इंटेलीजेंस एजेन्सियां अपना काम निकलवाने के लिए किस हद तक जाती है। इंटेलीजेंस एजेन्सियां (Intelligent agencies) साम-दाम-दंड-भेद तकरीबन हर रणनीति का इस्तेमाल अपना मकसद पूरा करने के लिए करती हैं। इनका ज़्यादातर काम ऑफ द रिकॉर्ड होता है। आइसबर्ग (Iceberg) की तरह दुनिया के सामने इनकी करामातों का बहुत छोटा-सा ही नमूना सामने आ पाता है। ये इतनी ताकतवर होती है कि कई देशों के बड़े नेता इनके सामने घुटने टेक देते है।

कई मुल्कों के आला ओहदों के सियासतदान, यहाँ तक कि कई बड़ी शख्सियतों को लालच देकर जानकारी और सबूत इकट्ठा करना, उनको ब्लैकमेल (blackmail) कर अपने हुक्म का तामील करवाना इनके लिए आम बात है। कई बार तो ऐसा भी देखने में आया है कि, ये एजेन्सियां कई मुल्कों में सरकारें तक बदलवा देती है। इनके फंड, एजेन्ट्स, नेटवर्क और आप्रेशंस का दायरा कई बार समझ से भी परे होता है।

इतिहास के पन्ने पलटकर देखने पर पता लगता है कि, दूसरे विश्वयुद्ध (World War – II) के दौरान जर्मनी (Germany) के बेरहम हुक्मरान एडोल्फ हिटलर (Adolf Hitler) की ताकत के सामने टिकना किसी भी मुल्क के लिए नामुमकिन था। लेकिन ब्रितानी हुकूमत की इंटेलीजेंस एजेन्सी मिलिट्री- इंटेलीजेंस ने इस नामुमकिन से लगने वाले काम को मुमकिन कर दिखाया। जिसके बाद हिटलर इतिहास के पन्नों में दफ़न होकर ही रह गया।

CIA ने किये कई सनसनीखेज़ खुलासे, Indira Gandhi के समय से चल रहा है funding का सिलसिला

इस मसले को लेकर अमेरिकी खुफ़िया एजेन्सी सीआईए ने काफी सनसनीखेज़ खुलासे किये है। खुफ़िया एजेन्सी ने कुछ पुराने क्लासीफाइड डॉक्यूमेंट सार्वजनिक किये है। जिनके मुताबिक साल 1985 के दौरान सोवियत संघ इंदिरा गांधी के कार्यकाल में कांग्रेस पार्टी (Congress Party) के कई सदस्यों और कम्युनिस्ट (communist) नेताओं को फंडिंग देता था। दस्तावेज़ों के मुताबिक उस दौरान तकरीबन 40 फीसदी सांसदों को सोवियत संघ का पैसा पहुँचाता था। ताकि भारतीय राजनीति और आंतरिक मामलों में उसका सीधे तौर पर दखल बना रहे। इस पूरी कवायद में असली खेल केजीबी खेल रही थी।

KGB के खुफ़िया कागज़ातो से हुआ बड़ा खुलासा, साज़िश के तहत हुई लाल बहादुर शास्त्री की हत्या

ठीक इस तर्ज पर साल 2005 के दौरान खुद केजीबी के कुछ खुफ़िया कागज़ात सामने आये, जिनमें कुछ इसी तरह की जानकारी की बात कही गयी थी। कहीं ना कहीं KGB ने लालबहादुर शास्त्री (Lal Bahadur Shastri) पर भी शिंकजा कसने की कोशिश की होगी, लेकिन आला शख़्सियत वाले शास्त्री जी उनके जाल में फंसने से बच गये। जिसके चलते साज़िशन ताशकंद ने उनकी हत्या करवायी गयी हो। दूसरे समकालीन भारतीय नेताओं की तुलना में लाल बहादुर शास्त्री केजीबी के लिए अपवाद थे। इसीलिए आज तक उनकी मौत कई कयासों के बीच झूलती है।

इसके बाद देश की सियासत में इंदिरा गांधी (Indira Gandhi) का दखल होता है। उनकी शख़्सियत में इंसानी कमजोरियां बहुत ज़्यादा थी। जिसकी मिसाल पूरी दुनिया के सामने है। साल 1971 का भारत-पाक युद्ध (India-Pakistan war) इस मिसाल की नज़ीर है। हिन्दुस्तानी फौज ने तकरीबन एक लाख पाक फौजियों के हथियार रखवाये। बावजूद इसके इंदिरा गांधी ने शिमला समझौते पर दस्तख़्त करके जीत को हार में तब्दील कर दिया। पूरी दुनिया, पाकिस्तानी सरमायेदार और उस वक़्त के वज़ीर-ए-आज़म ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो इंदिरा गांधी के रवैये से काफी हैरत में थे। मामला शीशे की तरह साफ था। कोई ताकत इंदिरा गांधी को अपनी उंगलियों पर नचा रही थी। बड़ा सवाल ये कि इंदिरा गांधी किसके हाथ की कठपुतली बनी हुई थी?

Funding के मामले में वासिली मित्रोकिन की किताब से Congress के कई बड़े नेताओ के नाम आये सामने

साल 2005 के दौरान केजीबी के रिटायर्ड कर्मचारी वासिली मित्रोकिन (Masili Mitrokhin) की किताब ने कांग्रेस के बुरी तरह झकझोर दिया। किताब में दावा किया गया था कि, सोवियत संघ के जमाने में सूटकेस भर-भर कर इंदिरा गांधी और कांग्रेस पार्टी के दूसरे सदस्यों के लिए रकम भेजी गयी। इन्हीं पैसों का इस्तेमाल पूर्व रक्षा मंत्री वी.के. मेनन (Defense Minister VK Menon) और दूसरे केन्द्रीय मंत्रियों ने चुनाव प्रचार के लिए किया। भारत पर पकड़ बनाये रखने के लिए सोवियत संघ अपने कॉन्सुलेंट में भारी कैश रिजर्व रखता था। भारत के रास्ते क्रेमलिन के हुक्मरान दक्षिण-एशियाई राजनीति में अपना दखल बनाये रखना चाहते थे। जिसके लिए वो कांग्रेस पार्टी का बेझिझक इस्तेमाल करते रहे।

इकनॉमिक टाइम्स (Economic Times) की रिपोर्ट के मुताबिक सीआईए के दस्तावेजों में आरोप लगाया गया कि, सोवियत संघ ने भारतीय कारोबारियों के साथ समझौतों के जरिए कांग्रेस पार्टी को रिश्वत दी। इनमें सीपीआई और सीपीएम को भी सोवियत संघ से फंडिंग मिलने की बात कही गई है। रिपोर्ट में ये भी बताया गया कि, सभी राजनेताओं को वित्तीय मदद नहीं दी जाती थी। इनमें इंदिरा गांधी को कड़ी टक्कर देने वाले एक नेता का भी नाम शामिल है। आखिरकर केजीबी में एक मान्यता ये स्थापित हो गयी कि, भारत में पैसों के दम पर राजनेताओं को कठपुतली बनाना और सियासी समीकरण तैयार करना बेहद आसान काम है।

इसके बाद तो गांधी परिवार में विदेशी खुफ़िया एजेन्सियों का दखल बेहद बढ़ गया। कयास ये भी लगाये जाते रहे है कि, इंदिरा गांधी के कार्यकाल से शुरू हुई रवायत आज तक बदस्तूर यूँ ही जारी है। संजय गांधी (Sanjay Gandhi) की हवाई दुर्घटना में मौत, हथियारों की डील और लॉबिंग से जुड़े खुलासे दिखाते है कि, राजीव गांधी (Rajiv Gandhi), सोनिया गांधी (Sonia Gandhi) और राहुल गांधी (Rahul Gandhi) इंटेलीजेंस एजेन्सियों का आसान शिकार बनते रहे। लालच देकर फंसाना और मनमाफिक काम करवाना एजेन्सियों का शौक बन गया। हथियारों की डील में बिचौलियें किस हद तक जाते है, ये जगज़ाहिर है। जहाँ मामला खरबों रूपयों से जुड़ा हो, वहाँ अच्छे-अच्छे लोगों की नीयत डगमगा जाती है।

यूपीए-1 और यूपीए-2 की रवानगी के साथ देश के सियासी पर्दे पर नरेन्द्र मोदी (Narendra Modi) उभरकर सामने आते है। मजबूत शख़्सियत और चट्टानी इरादों के सामने विदेशी दलालों, बिचौलियों और इंटेलीजेंस एजेन्सियों का दाल नहीं गलती। ज़मीन हड़पने की होड़ में बौखलाये चीन (China) के सामने पीएम मोदी बड़ी रूकावट बनकर उभरते है। ताजा खुलासा तो और भी भयानक है। अब कांग्रेस में केजीबी के साथ चीनी खुफ़िया एजेन्सियों का दखल भी दिख रहा है।

Congress पार्टी को लेकर हुआ एक और बड़ा खुलासा

हाल ही में खुलासा हुआ है कि चीनी दूतावास ने इंडियन नेशनल कांग्रेस के तहत चलने वाले राजीव गांधी फांउडेशन को समय-समय पर अच्छी खासी रकम दान में दी है। जिसके एवज़ में साल 2008 में यूपीए-1 के दौरान कांग्रेस पार्टी और कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ चाइना ने उच्च स्तरीय सूचनाओं से आदान-प्रदान से जुड़े समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किये। बड़ा और अहम सवाल ये है कि आखिर राजीव गांधी फांउडेशन को चीनी फंडिंग की जरूरत क्यों पड़ी? कांग्रेस, कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ चाइना से किन उच्चस्तरीय सूचनाओं का आदान-प्रदान कर रही है?

Modi सरकार के विदेश मंत्री के बेटे और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार भी सवालों के घेरे में

टेलीग्राफ में छपी ताज़ा रिपोर्ट के मुताबिक थिंक टैंक ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन को साल 2016 के दौरान 1.25 करोड़ रूपये की चीनी मदद हासिल हुई थी। विदेश मंत्री एस. जयशंकर के बेटे ध्रुव जयशंकर इस संस्थान से जुड़े हुए है। साथ ही ये भी दावा किया गया है कि, विवेकानंद इंटरनेशनल फाउंडेशन को भी चीनी वित्तीय सहायता हासिल करवायी जाती रही है। जिसके संस्थापक सदस्य खुद राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित दोभल रहे हैं। ताजा हालातों में कांग्रेस ने भी भाजपा पर बड़ा आरोप लगाते हुए कहा कि- चुनाव बॉड के जरिये बीजेपी को चीन ने भारी पैसा मुहैया करवाया है।

देश की राजनीति में खुफ़िया एजेन्सियों का दखल कोई नयी बात नहीं है। इससे अमेरिका भी अछूता नहीं रहा। अमेरिकी राष्ट्रपति चुनावों में रूसी हस्तक्षेप की अफवाहें कहीं ना कहीं शक की सुई केजीबी की ओर ले जाती है। सच्चाई खैर जो भी हो, लेकिन अन्दरखानें ये एजेन्सियों रोज कुछ नया कारनामा रचती है। जिसका असर सियासत से लेकर आम जनता तक आता है।

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