ठीक होने के बाद भी COVID-19 नहीं छोड़ रहा लोगों का पीछा

दुनिया भर के कई हिस्सों से खबरें सामने आ रही हैं कि इस बीमारी से उबर चुके मरीज़ दोबारा इसकी चपेट में आने लगे हैं

नई दिल्ली ब्यूरो (शौर्य यादव): प्लाज़्मा थेरेपी, रैपिड टेस्ट, जीनोम कोडिंग-डिकोडिंग और वैक्सीनेशन ट्रायल जैसे प्रयास मौजूदा दौर में वायरस इनफेक्शन के बढ़ते खतरे पर लगाम कसने में नाकाम रहे हैं। दुनिया भर के वैज्ञानिक कारगर इलाज ढूंढने की कोशिश में लगे हुए हैं। वायरस की सीधी लड़ाई इंसानी प्रतिरोधक प्रणाली से है। फिलहाल मज़बूत इम्यून सिस्टम ही वायरस को रोक पा रहा है। मौजूदा हालातों में डॉक्टर लक्षणों के आधार पर दवाई दे रहे हैं।

दुनिया भर के कई हिस्सों से खबरें सामने आ रही हैं कि इस बीमारी से उबर चुके मरीज़ दोबारा इसकी चपेट में आने लगे हैं। जापानी चैनल एनएचके के मुताबिक टोक्यो के एक अस्पताल में 70 वर्षीय बुज़ुर्ग लगातार दूसरी बार वायरस से संक्रमित हुए हैं। टेस्ट के नतीजे नेगेटिव आने के बाद उन्हें अस्पताल से छुट्टी दे दी गई थी लेकिन कुछ ही दिनों बाद उनकी तबीयत बिगड़ने लगी और जांच करने पर उनमें फिर से वायरस संक्रमण पाया गया।

कुछ इसी तरह की खबरें चीन के वुहान प्रांत से भी सामने आ रही हैं। लॉकडाउन खुलने के बाद वुहान में ज़िंदगी सामान्य पटरी पर उतर ही रही थी कि इस दौरान कुछ लोग फिर से संक्रमित पाए गए। स्पेन में हुई नेशनल सेंटर फॉर बायोटेक्नोलॉजी (सीएसआईसी) की रिसर्च बताती है कि 14 फ़ीसदी मामलों में मरीज़ वायरस से दोबारा संक्रमित हुए हैं। ऐसे में शरीर में पहले से मौजूद वायरस अपनी संख्या फिर से बढ़ाते हैं। मेडिकल जगत की भाषा में इसे बाउंसिंग बैक कहा जाता है। कमज़ोर प्रतिरोधक क्षमता वाले मरीज़ों में ऐसे मामले ज़्यादा देखने को मिल रहे हैं।

टेस्ट रिपोर्ट नेगेटिव आने का कतई ये मतलब नहीं कि इंसानी शरीर से वायरस पूरी तरह नष्ट हो गया है। वायरस तकरीबन तीन महीने तक इंसानी शरीर में रह सकता है। वैज्ञानिक, इसके पीछे वायरस के तेज़ी से बदल रहे मॉलिक्यूलर स्ट्रक्चर और डीएनए सीक्वेंसिंग को कारण मानते हैं। जिसकी वजह से वायरस और भी ज़्यादा घातक रूप अख़्तियार कर सकता है। रिसर्च ये भी बताती है कि वुहान में पाया गया कोरोना का वायरस अमेरिका में फैल रहे वायरस से अलग है। वायरस का तेज़ी से बदल रहा गुणधर्म वैज्ञानिकों के लिए कड़ी चुनौती बनता जा रहा है।

दोबारा संक्रमण उभरने का एक बड़ा कारण ये भी माना जा रहा है कि संक्रमित हुए शख्स के खून में इस वायरस के खिलाफ एंटीबॉडीज नहीं बन पा रहे हैं। चीन की फुदान यूनिवर्सिटी के माइक्रोबायोलॉजिस्टों ने अपने अध्ययन में पाया कि वायरस इन्फेक्शन से पूरी तरह ठीक हो चुके 130 लोगों में से सिर्फ 10 लोगो के शरीर में वायरस के खिलाफ एंटीबॉडीज विकसित हुए। अन्य लोगों के शरीर में जो एंटीबॉडी मिले हैं, वह भी पूरी तरह से विकसित और कारगर नहीं है। कुछ ऐसे भी लोग मिले जिनके शरीर में वायरस के लक्षण तो नहीं थे लेकिन जांच के दौरान वायरस की मौजूदगी उनके शरीर में देखी गयी। चीन में ज्यादातर एंटीबॉडी उन लोगों में विकसित नहीं हो पा रही है जिनकी प्रतिरक्षा प्रणाली बेहद कमज़ोर थी। ठीक इसी तर्ज पर दक्षिण कोरिया में भी 91 लोग कोरोना मुक्त होने के बाद दोबारा इंफेक्शन पॉजिटिव पाए गए।

गौरतलब है कि एंटीबॉडी शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली से पैदा होते हैं। जब हमारे शरीर पर किसी वायरस का हमला होता है तब शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली खुद ही बचाव तंत्र विकसित करती है। यही बचाव तंत्र एंटीबॉडी कहलाता है। अगर शरीर पर अगली बार वायरस का हमला हो तो शरीर खुद ही उससे लड़ने में सक्षम हो जाता है

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