Bihar Election: नीतीश कुमार को लगा करारा झटका, NDA में पड़ी दरार

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न्यूज़ डेस्क (समरजीत अधिकारी): बिहार विधानसभा चुनावों (Bihar Election) से ठीक पहले राष्ट्रीय जनतान्त्रिक गठबंधन (NDA) कुनबे टूट के आसार बनते नज़र आ रहे है। हाल ही नीतीश कुमार ने बड़ी घोषणा करते हुए दलित वर्ग समुदाय के लोगों को नौकरी देने के नियम तय किये थे। जिसके मुताबिक अगर किसी दलित की मृत्यु जातीयगत भेदभाव के चलते हो जाती है तो उसे बिहार सरकार नौकरी देगी। जिसके बिहार की स्थापित दलित राजनीति (Established Dalit Politics of Bihar) में बड़ा भू-चाल आ गया। बिहार में दलित और महादलित की राजनीति करने वाले दलों ने इसे अपने वोटबैंक में बड़ी सेंध माना। लोजपा अध्यक्ष चिराग पासवान (LJP President Chirag Paswan) ने इसे राजनीति से प्रेरित कदम बताते हुए, फैसले की निंदा की।

लोजपा ने इस मुद्दे पर आपत्ति जताते हुए खत लिखा। चिराग पासवान ने नीतीश पर दलितों से वादाखिलाफी का सीधा आरोप लगाया और लिखा कि, अगर बिहार सरकार दलित हितों को लेकर इतनी ही फिक्रमंद है तो, पिछले कई सालों में मारे गये दलित समुदाय के लोगों की खोज खब़र क्यूं नहीं ली गयी। दिलचस्प है तो नीतीश कुमार और चिराग पासवान के सियासी तालुक्कातों के बीच पिछले कुछ वक्त से तल्खियां देखी जा रही है। हाल ही में जब दलित नेता जीतन राम मांझी (Dalit leader Jeetan Ram Manjhi) की नज़दीकियां नीतीश कुमार से बढ़ती दिखी तो लोजपा में खासा खलबली का माहौल भी देखा गया था।

जीतन राम मांझी के अलावा चिराग पासवान का पेंच मुख्यतौर पर सीटों के बंटवारे को लेकर फंसा हुआ है। एलजेपी आगामी चुनावों में साल 2015 में बिहार विधानसभा चुनावों के तर्ज पर टिकटों का बंटवारा चाह रही है। उस दौरान रामविलास पासवान की अगुवाई में एलजेपी ने 40 सीटों पर चुनाव लड़ा था। बदले राजनीतिक हालातों के बीच चिराग पासवान को 25 से 27 सीटों पर चुनाव लड़ने का ऑफर मिला, जिससे वे बेहद नाराज़ है।

मौजूदा सियासी तस्वीर के बीच अब चिराग के पास दो ही रास्ते बचे हुए है। पहला वो या तो एनडीए का हिस्सा रह कर नीतीश कुमार की अगुवाई में चुनाव लड़े या फिर राज्य में नीतीश कुमार से अलग होकर किसी भी एनडीए प्रत्याशी के खिलाफ लोजपा उम्मीदवार को मैदान में ना उतारे। दूसरी ओर जनता दल यूनाइटेड (Janta Dal United) ने ये भी साफ कर दिया है कि, वह लोक जनशक्ति पार्टी (Lok Janshakti Party) के साथ साझा टिकट बंटवारे को लेकर कोई भी बातचीत नहीं करेगी। क्योंकि जेडीयू पहले से ही एनडीए खेमे का हिस्सा है। ऐसे में बिहार के एनडीए दूसरे घटक दलों के बात करने का सवाल ही नहीं उठता है।

दिलचस्प ये है कि भाजपा आलाकमान ने बिहार में एनडीए के सभी घटक दलों को आपसी समझ कायम करते हुए चुनाव लड़ने के सुझाव दिये है। जेपी नड्डा इस राजनीतिक असहजता वाली स्थिति (Political uneasiness) को दरकिनार करते हुए नीतीश कुमार से काफी खुश है। जिस तरह नीतीश कुमार जीतनराम मांझी को एनडीए कुनबे में खींच लाये उससे राष्ट्रीय जनतान्त्रिक गठन की मौजूदगी बिहार में काफी मजबूत हो जायेगी। बिहार की सियासत की ज़मीनी समझ रखने वाले लोग मानते है कि, लोजपा ये सब सिर्फ बिहार चुनावों में अपने शर्ते मनवाने के लिए कर रही है। जिससे उनके पास कुछ विकल्प आ जाये। कड़वीस सच्चाई ये है कि, अभी लोजपा के पास मात्र दो विधायक है। एक दूसरी तस्वीर ये भी हो सकती है कि, नीतीश कुमार लोजपा के स्थापित वोटबैंक सेंध लगाने के लिए हिन्दुस्तानी आवाम मोर्चा (Hindustani Awam Morcha) को तव्ज़जो दे सकते है।

खब़र लिखे जाने तक लोक जनशक्ति पार्टी (LJP) बिहार संसदीय बोर्ड की बैठक में फैसला लिया गया कि, 143 विधानसभा सीटों के लिए उम्मीदवारों की सूची बनाई जायेगी। इसे जल्द से जल्द संसदीय बोर्ड को मंजूरी के लिए भेज दिया जायेगा। साथ ही ये भी प्रस्ताव पारित किया गया कि, बिहार चुनावों में गठबंधन से जुड़े सभी फैसले पार्टी राष्ट्रीय अध्यक्ष लेगें। साथ ही कयास ये भी लगाये जा रहे है कि, इस बैठक के दौरान लोक जनशक्ति पार्टी, जनता दल यूनाइटेड (JDU) के साथ अपने राजनीतिक संबंधों की समीक्षा एक बार फिर से की है। राजनीतिक जानकारों की मानें तो चिराग पासवान अपने सियासी हैसियत से अच्छी तरह वाकिफ है। इसलिए उन्होनें ये कदम काफी सोच विचार के बाद उठाया है। नीतीश कुमार को जिस तरह से चिराग पासवान अवसरवादी बता दिया है। उससे नीतीश कुमार को प्रदेश की राजनीति में झटका लगने के आसार पुख्ता तौर पर बनेगें। साथ ही इस प्रकरण ने साबित ये भी कर दिया है कि, एनडीए के कुनबे कहीं ना कहीं एक दरार है जिसका फायदा यूपीए आने वाले समय में उठा सकती है।

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